सार्वजनिक शिक्षा (Universal Education) का अर्थ बताते हुए इसकी विशेषताओं का वर्णन कीजिये ?

 

सार्वजनिक शिक्षा (Universal Education) का अर्थ बताते हुए इसकी विशेषताओं का वर्णन कीजिये ?

11.0 उद्देश्य
इस इकाई के अध्ययन के पश्चात् आप इस योग्य होने चाहिये कि
• सार्वजनिक शिक्षा (Universal Education) का अर्थ बता सकें ।
• सार्वजनिक शिक्षा से होने वाले प्रमुख लाभों को गिना सकें ।
सार्वजनिक शिक्षा का भारत में आरंभ कैसे हुआ यह बता सके ।
• सार्वजनिक शिक्षा के उपयुक्त विकास में बाधक कारणों को बता सके ।
सार्वजनिक शिक्षा के विकास की गति को तेज करने के लिए उपयुक्त सुझाव दे सके ।

भूमिका

शिक्षा वैयक्तिक, सामाजिक तथा राष्ट्रीय प्रगति के लिए एक अपरिहार्य आवश्यकता है। । शिक्षा की अनिवार्यता देश की सभ्यता एवं संस्कृति के विकास हेतु एवं राष्ट्रीय उद्देश्यों के अनुकूल समाज के पुननिर्माण के लिए अपेक्षित है । किसी देश का संविधान उसका राजनीतिक व्यवस्था का वह बुनियादी ढांचा निर्धारित करता है जिसके अंतर्गत उसकी जनता शामिल होती है । लोकतंत्र में प्रभुसत्ता जनता में निहित होती है और जनता का शिक्षित होना लोकतंत्र को मजबूत बनाता है । सभी को शिक्षा उपलब्ध हो यदि प्रत्येक व्यक्ति को आधारभूत प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध नही होगी तो जो भौतिक संस्कृति में सामाजिक परिवर्तन तेजी से आ रहे है, उनके अनुकूल अभौतिक संस्कृति अर्थात् मूल्यों और मान्यताओं में परिवर्तन नही आ सकते और फलतः सांस्कृतिक विलम्बन उत्पन्न होकर सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया अवरुद्ध हो जायेगी । प्राथमिक शिक्षा इस सांस्कृतिक विलम्बना का निराकरण कर सामाजिक प्रक्रिया को पूर्ण करने में सहायक होगी ।

11.2 सार्वजनिक शिक्षा का अर्थ

शिक्षा का सार्वजनीकरण या सार्वभौमिकरण रो अभिप्राय है एक निश्चित स्तर तक सभी के लिए अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा को उपलब्ध कराना । भारतीय संविधान के नीति निदेशक तत्वों के अन्तर्गत व्यवस्था की गई राज्य 10 वर्षों के भीतर 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था करेगा । अर्थात् देश के 6-14 वर्ष तक की आयु के सभी बालक बालिकाएं, 1960 तक, विद्यालयों में आ जाने चाहिए थे किन्तु यह समय सीमा 1960 से 1972 कर दी गई । 12 वर्षों में भी प्रयास सफल नहीं हुए, पुन: बढ़ाकर 1976 तथा 1990 किया गया अन्त में 2000 तक बढ़ाया गया अब सर्वशिक्षा अभियान के नाम से 2010 तक बढ़ाया गया है।
“सार्वजनिक शिक्षा”जिसे अंग्रेजी में (Universal Education) कहा जाता है को International Dictionary of Education (London1979) में इस प्रकार परिभाषित किया गया है ।
Universal Education: System of education extending opportunities to all regardless of race,colour,creed,sex or ability अर्थात् सार्वजनिक शिक्षा वह व्यवस्था है । जिससे सभी को प्रजाति रंग, धर्म, लिंग या योग्यता की भिन्नताओं के बावजूद, शैक्षिक अवसर उपलब्ध कराये जाते है ।।
सार्वजनिक शिक्षा की विशेषता यह होती है कि सभी को इसे अनिवार्य रूप से प्रदान किया जाता है यह यथासम्भव निःशुल्क भी दी जाती है ।
शिक्षा के सार्वजनीकरण की संकल्पना भारत में प्राचीन काल में ही विकसित हो चुकी थी यद्यपि मध्यकाल एवं ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत आधुनिक भारत के शासकों की उपेक्षा के कारण इराकी गति अवरूद्ध रखी किन्तु विदेशी शासन के विरूद्ध स्वाधीनता आन्दोलन के समय इसकी माँग प्रबल हुई। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद संविधान में इसका प्रावधान किया गया ।
शिक्षा के सार्वजनीकरण की संकल्पना देश काल के परिप्रेक्ष्य में शनैः शनैः विकसित हुई तथा इसके अर्थ में स्पष्टता एवं व्यापकता आती गई । शिक्षाविदों के विचार, देश की आर्थिक दशा, जनसाधारण की मनोवृत्ति शिक्षा प्रणाली आदि घटकों का शिक्षा के सार्वजनीकरण की धारणा में परिवर्तन संशोधन एवं परिवर्तन होता रहा । निम्नांकित कथनों द्वारा शिक्षा के सार्वजनीकरण की संकल्पना स्पष्ट होती है ।
के.पी नायक के शब्दों में :- शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का एक सशक्त माध्यम बनाने तथा इसे राष्ट्रीय विकास के संबद्ध करने की आवश्यकता है । शिक्षा को भारत में जनसाधारण के उस वर्ग की और उन्मुख करता है जो गरीबी की रेखा से नीचे जीवन-यापन कर रहे है ताकि उनमें आत्मचेतना जागत हो और उनकी उत्पादक क्षमताएँ प्रस्फुटित होकर उन्हें राष्ट्र निर्माण के कार्य में प्रभावी रूप से सहभागी बनाने योग्य बनाया जा सके । योजना उपयोग के सदस्य एस. चक्रवर्ती का कथन है कि “सामाजिक पुनः निर्माण करने की दृष्टि से जिसके लिए देश की प्रतिबद्धता है, प्राथमिक शिक्षा के सार्वजनिकरण की समस्या का निःसंदेह निर्णायक महत्व है ।” शिक्षा के सार्वजनिकरण को सामान्यतः शिक्षा का सार्वभौमीकरण कहा जाता है ।

वर्तमान विचारधाराओं के अनुसार किसी भी राष्ट्र की प्रगति का मापदण्ड उस देश की शिक्षा व्यवस्था के स्वरूप एवं स्थिति को माना जाता है । इसी दृष्टिकोण के अनुसार किसी भी राष्ट्र की शिक्षा व्यवस्था में प्राथमिक शिक्षा अपना विशिष्ट स्थान रखती है क्योंकि यही शिक्षा की प्रथम सीढी होती है तथा इसी के आधार पर राष्ट्र की भावी उच्च शिक्षा की पृष्ठभूमि का निर्माण होता है । राष्ट्रीय जीवन से निरक्षता का उन्मुलन करने के लिए जीवन की सफलता के लिए तथा प्रजातंत्र के निर्माण के लिए प्रगतिशील मार्ग-प्रशस्त करने के उद्देश्य से भारतीय संविधान के निर्माताओं ने भारतीय संविधान की धारा 45 में संवैधानिक निर्देश का इरा प्रकार से प्रतिपादन किया है । राज्य इस संविधान के क्रियान्वित किये जाने के समय से दस वर्ष के अन्तर्गत जब तक कि सभी बालक 14 वर्ष की आयु पूर्ण नही कर लेंगे, निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने का प्रयास करेगा । इरा संवैधानिक निर्देश के प्रतिरोपण से स्पष्ट होता है कि इसका मूल उद्देश्य शिक्षा को सार्वभौम बनाना था ।”
“संविधान में धारा 15 में व्यवस्था दी गई है कि यह अनिवार्य शिक्षा सबके लिए होगी चाहे वह किसी भी जाति, रंग, धर्म, लिंग स्थान तथा वर्ग का हो” ।।

विश्व शिक्षा फोरम का एक सम्मेलन ढाका में हुआ जिसमें निर्णय लिया गया कि सभी बालकों को शिक्षा के दायरे में लाया जाये । इरा प्रस्ताव को भारत सरकार ने स्वीकार किया और इरा प्रस्ताव की भावना का सम्मान करते हुए भारत सरकार ने निर्णय लिया कि 2010 तक प्राथमिक शिक्षा का सार्वभौमिकरण कर दिया जायेगा । इसके लिए भारत सरकार ने सर्वशिक्षा अभियान चलाया । इस अभियान का उद्देश्य सभी (सर्व) बालकों को शिक्षा उपलब्ध कराना है । राष्ट्र जीवन से निरक्षता का उन्मुलन करने के लिए जीवन की सफलता के लिए तथा देश की आर्थिक उन्नति के लिए भी शिक्षा अनिवार्य है । लोकतांत्रिक देश में शिक्षा की आवश्यकता और भी अधिक बढ़ जाती है क्योकि शिक्षित नागरिक देश के कर्णधार होते है । लोकतंत्र की सफलता के लिए सुनागरिकता का होना आवश्यक है । शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी व्यक्ति अपने अधिकारों, कर्तव्य तथा उत्तरदायित्वों के प्रति सचेत होता है ।।
शिक्षा व्यक्ति में सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक एवं सांस्कृतिक जागरूकता लाती है ।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *