शिक्षा द्वारा देश में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को बढ़ावा देने के लिए कोठारी आयोग ने क्या क्या सुझाव दिये ?

शिक्षा द्वारा देश में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को बढ़ावा देने के लिए कोठारी आयोग ने क्या क्या सुझाव दिये ?

दिया जाये । 4. जाति, वर्ग, लिंग, स्थिति, धर्म का भेद भाव किये बिना सभी बच्चों को शिक्षा के समान अवसर दिये जाये 

5. सभी व्यक्तियों में वैज्ञानिक विचार और दृष्टिकोण का विकास किया जाये ।।

6. सभी व्यक्तियों में सहिष्णुता, जनहित, समाजसेवा, आत्म अनुशासन, आत्मनिर्भरता के
गुणों का विकास किया जाये ।

शिक्षा द्वारा आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में तीव्रता

शिक्षा द्वारा देश में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को बढ़ावा देने के लिए कोठारी आयोग  निम्न सुझाव देता हैं। |

1. सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में आधुनिकीकरण करने के लिए विज्ञान पर | आधारित तकनीक अपनायी जाये ।।

2. आधुनिकीकरण के लिए शिक्षा को एक महत्वपूर्ण साधन माना जाये और आधुनिकीकरण की गति को शैक्षिक उन्नति की गति के साथ सम्बद्ध किया जाये ।

3. शिक्षा द्वारा उत्सुकता को जाग्रत किया जाये और उचित दृष्टिकोणों तथा मान्यताओं का विभाजन किया जाये ।।

4. शिक्षा के दवारा स्वयं अध्ययन, स्वतंत्र विचार और स्वयं निर्णय की आदतों के विकास किया जाये।

5. सामान्य व्यक्ति के शैक्षिक स्तर को ऊँचा उठाया जाये और एक ऐसे शिक्षित समाज का निर्माण किया जाय, जिसमें समाज के सभी अंगों के व्यक्ति हो और उनके विश्वासों
तथा आकांक्षाओं पर गहरी भारतीय छाप लगी हो ।

5 शिक्षा द्वारा सामाजिक, नैतिक और आध्यात्मिक मान्यताओं का विकास और चरित्र निर्माण सामाजिक और नैतिक मूल्यों के विकास के लिए आयोग ने निम्न सुझाव दिये हैं :

1. केन्द्र तथा राज्य सरकारों द्वारा सभी शिक्षा संस्थानों में नैतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक मान्यताओं के शिक्षा की व्यवस्था की जाये इनकी शिक्षा यू.जी.सी. द्वारा दिये गये सुझाव के अनुसार दी जाये ।।

2. निजी प्रबन्ध द्वारा संचालित शिक्षा संस्थाओं में भी इन सुझावों के अनुसार नैतिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक मान्यताओं की शिक्षा दी जाये ।

3. प्राथमिक स्तर पर इन मान्यताओं की शिक्षा रोचक कहानियों द्वारा दी जाये ये कहानियाँ विश्व के विभिन्न धर्मों द्वारा चुनी जा सकती है ।

4. माध्यमिक स्तर पर इन मान्यताओं के विषय में शिक्षकों तथा छात्रों के बीच विचार विमर्श किया जाये ।

5. विदयालय की समय तालिका में सप्ताह में एक या दो समय चक्र (Period) नैतिक एवं आध्यात्मिक मान्यताओं के शिक्षण के लिए रखे जाये ।

6. विद्यालय वातावरण को सामाजिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक मान्यताओं से पूर्ण बनाया जाये इसके लिए सभी शिक्षकों एवं अधिकारियों को उत्तरदायी बनाया जाये ।।

7. शिक्षकों दवारा छात्रों के समक्ष आदर्श व्यवहार का नमूना प्रस्तुत किया जाये वे अपने विषयों के शिक्षण में इन मान्यताओं के विकास के लिए कार्य करें ।

8. विश्वविद्यालयों में तुलनात्मक धर्म (Comparative Religion) नामक विभाग की स्थापना की जाये इन विभागों में इस बात की खोज की जाय कि इन मान्यताओं को प्रभावशाली ढंग से किस प्रकार पढ़ाया जाये और छात्रों तथा शिक्षकों के प्रयोग के लिए इनसे सम्बन्धित विशेष साहित्य तैयार किया जाये ।

समीक्षा –

कोठारी आयोग दवारा शिक्षा के राष्ट्रीय उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए उपरोक्त व्यापक सुझाव प्रस्तुत किये है । वास्तव में यदि इन सुझावों को अमल में लाया गया होता तो भारतीय शिक्षा द्वारा राष्ट्र की कोई भी आकांक्षा असंतुष्ट नहीं रहती । परन्तु इन सुझावों को व्यावहारिक धरातल कम प्राप्त हुआ हैं, संभवत राष्ट्रीय इच्छाशक्ति एवं संसाधनों की कमी के कारण श्रेष्ट आदर्शों की प्राप्ति संभव नहीं हो सकी है । वैसे भी पांचों बिन्दुओं पर दिये गये सुझावों का केन्द्रीय पक्ष उच्च वैज्ञानिक शिक्षण व चिन्तन को बढ़ावा देना हैं । साथ ही कुछ सुझावों की प्राप्ति के लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था को लम्बे समय तक कार्य करना होगा । परन्तु यह सत्य है कि इन चिन्तन बिन्दुओं के आलोक में शिक्षा के राष्ट्रीय लक्ष्यों का निर्धारण किया जा सकता है ।

6.3 लोकतांत्रिक भारत में वर्तमान शिक्षा के राष्ट्रीय लक्ष्य

प्रत्येक समाज और राष्ट्र अपने जीवन लक्ष्यों के सिद्धि के लिए शिक्षा संगठन की स्थापना करता है । लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में भारत के राष्ट्रीय शैक्षिक उद्देश्यों को विवेचन निम्न प्रकार से किया जा सकता

स्वतन्त्रता का संरक्षण

| भारत राष्ट्र ने 15 अगस्त 1947 को विदेशी दासता का जुआ उतार कर अपनी राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त कर ली थी, परन्तु स्वतंत्रता का अर्थ सिर्फ राजनैतिक नहीं होता । महात्मा गांधी के अनुसार ‘अभी स्वतंत्रता का उद्देश्य अधूरा है, राजनैतिक स्वतंत्रता के साथ आर्थिक स्वतंत्रता, सामाजिक स्वतंत्रता और भाषायी स्वतंत्रता और सांस्कृतिक स्वतंत्रता की प्राप्ति आवश्यक है । जब तक स्वतंत्रता का बोध समाज का निम्नतम वर्ग प्राप्त नहीं कर लेता उसमें आत्मचेतना और मनुष्य होने का बोध जाग्रत नहीं हो जाता तब तक राजनैतिक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है । राजनैतिक स्वतंत्रता के बाद हमने संस्कृति और आर्थिक परतंत्रता ग्रहण कर ली है । हमारे देश के मुट्ठी भर अंग्रेजी भाषी लोग आम जन को भाषायी दासता से मुक्त नहीं होने देते वे अपने स्वार्थों के गुलाम हो गये है । इसीलिए देश में नव अभिजात्य वर्ग द्वारा शोषण के नये-नये तरीके इजाद किये जाते हैं । भारत की नव पीढ़ी अपने सांस्कृतिक मूल्यों से विमुख न होने पाये, इसके लिए वास्तविक स्वतंत्रता का लक्ष्य शिक्षा के राष्ट्रीय उद्देश्यों का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है ।।
शिक्षा के विभिन्न अंगों दवारा स्वतंत्रता के प्रशिक्षण पर जोर दिया जाना चाहिए, पाठ्यक्रम, शिक्षण विधि, शिक्षक-विद्यार्थी सम्बन्ध और अनुशासन की स्थापना इस प्रकार की जानी चाहिए कि बालक में स्वतंत्रता के वृहत् दृष्टिकोण का विकास हो जिससे स्वतंत्रता के साथ आत्म नियंत्रण स्वानुशासन और राष्ट्रीय कर्तव्यों का समाहार व्यक्तित्व में संभव हो सके । 

समानता की प्राप्ति

स्वतंत्रता बिना समानता के भाव संभव नहीं है । फ्रांस की क्रान्ति 1789 के गर्भ से तीन मोती निकले थे, जिन्होंने मानव जाति की प्रगति के नये द्वार खोले । स्वतंत्रत, समानता और बंधुत्व ये तीनों एक दूसरे के पूरक है । बिना समानता के स्वतंत्रता नहीं हो सकती बिना बन्धुत्व के समानता नहीं हो सकती । भारतीय समाज व्यवस्था प्राकृतिक और ऐतिहासिक कारणों से अत्यधिक जटिल है । यहां ऊंच नीच, जाति-पांति, धर्म-क्षेत्र वर्गों के विभाजन और अन्त: विभाजन विद्यमान है । इन समान्तर विभाजनों से ऊपर उठकर समानता की स्थापना एक अवितीय कार्य था, जिसका उद्देश्य राष्ट्र की जीवतता के लिए आवश्यक है । भारतीय संविधान में मूल अधिकारों के माध्यम से समानता को राष्ट्रीय लक्ष्य घोषित कर दिया गया है । जाति, धर्म, लिंग, वर्ग, क्षेत्र आदि के माध्यम से उत्पन्न असमानता को दण्डनीय अपराध की श्रेणी में रखा गया है । दमित और वंचित वर्ग को समानता के धरातल में लाने हेतु अनेक प्रयास किये जाते है । परन्तु देश में इसकी लक्ष्य की प्राप्ति अभी दूर की कौड़ी है । क्योंकि व्यक्ति का अहं ही असमानता का कारण है । जिसका परिमार्जन शिक्षा के माध्यम से ही संभव है । अत: भारतीय शिक्षा को उद्देश्यों और शिक्षा को इस प्रकार संगठित किया जाये कि समाज के पुराने विभाजन समाप्त हो और नवीन विभाजनों को उत्पन्न न होने दिया जायें ।

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