शिक्षा के पाठ्यक्रम तथा प्रक्रिया का अभिनवीकरण किस तरह किया जाना चाहिए ?

 

शिक्षा के पाठ्यक्रम तथा प्रक्रिया का अभिनवीकरण किस तरह किया जाना चाहिए ?

शिक्षा प्रणाली का क्रियान्वयन 
सर्वोच्च बौद्धिक स्तर, लक्ष्य की गंभीरता तथा नवाचार एवं सृजनात्मकता के लिए स्वतंत्रता के लिए शिक्षा के प्रबन्ध की आवश्यकता है | सम्पूर्ण राष्ट्र शिक्षा प्रणाली पर विश्वास करने लगा है | लोग निश्चित परिणामों की आशा करने लगे हैं । सभी अध्यापकों को पढ़ाना चाहिए तथा सभी छात्रों को पढ़ना चाहिए | इसके लिए शिक्षकों का उत्तरदायित्व होने, छात्रों को नियमानुसार व्यवहार करने, संस्थाओं को अच्छी सुविधाएँ उपलब्ध कराने तथा राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर निर्धारित मानदण्डों के अनुरूप मूल्यांकन की व्यवस्था होनी चाहिए ।

शिक्षा के पाठ्यक्रम तथा प्रक्रिया का अभिनवीकरण

शिक्षा के पाठ्यक्रम तथा प्रक्रिया को सांस्कृतिक विषय-वस्तु को अधिकाधिक सम्मिलित करके समृद्ध बनाया जायेगा । ललित कला, प्राचीन इतिहास जैसे विषयों के शिक्षण प्रशिक्षण तथा अनुसंधान कार्यों पर जोर दिया जायेगा, जिससे उन क्षेत्रों में मानव शक्ति की पूर्ति हो सके। सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों के विकास के लिए शिक्षा को महत्वपूर्ण उपकरण बनाने की दृष्टि से पाठ्यक्रम में आवश्यक समायोजन किये जायेंगें ।।
| पुस्तकों की सभी वर्गों तक आसान पहुंच के लिए इन्हें कम कीमतों पर उपलब्ध कराया जायेगा । पुस्तकों के गुणात्मक सुधार, अध्ययन आदतों के विकास तथा सृजनात्मक लेखन को प्रोत्साहित करने के उपाय किये जायेंगें । पूर्व स्थापित पुस्तकालयों के सुधार तथा नये पुस्तकालयों की स्थापना के कार्य किये जायेंगें ।
सूचनाओं के प्रसार, शिक्षकों में गुणात्मक सुधार तथा कला एवं संस्कृति के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए शैक्षिक तकनीकी का प्रयोग किया जायेगा | मीडिया बच्चों के साथ साथ बड़ों पर भी व्यापक प्रभाव डालता है अत: रेडियो, टीवी. आदि पर हिंसा तथा अलगाववादी प्रवृत्तियों के फैलाने सम्बन्धी कार्यक्रमों पर अंकुश लगाया जायेगा ।
शिक्षा के सभी स्तरों पर कार्यानुभव को शिक्षा का आवश्यक अंग बनाया जायेगा । यह छात्रों की रूचि एवं योग्यता के अनुसार विभिन्न स्तरों पर निर्धारित किया जायेगा | पर्यावरण के प्रति जागरूकता को शिक्षा प्रक्रिया का आवश्यक अंग बनाया जायेगा ।
गणित एवं विज्ञान की शिक्षा के विकास एवं विस्तार के प्रयास किये जायेंगे | इसके लिए आधुनिक तकनीकी विधियों का प्रयोग किया जायेगा । विज्ञान शिक्षा को स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग तथा दैनिक जीवन के विभिन्न घटकों से संबंधित किया जायेगा ।
| खेलकूद एवं शारीरिक शिक्षा अधिगम प्रक्रिया के अभिन्न अंग है अत: इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर मूलभूत सुविधाएं विकसित की जायेगी ।
शैक्षिक संस्थानों के माध्यम से युवाओं को राष्ट्रीय एवं सामाजिक विकास में सम्मिलित होने के अवसर दिये जायेंगें । इसके लिये उन्हें छब्ब्ण ए छZएएZएएZ आदि कार्यक्रमों एवं योजनाओं में भाग लेने हेतु प्रेरित किया जायेगा ।
शिक्षा के महत्वपूर्ण अंग के रूप में परीक्षाओं में गुणात्मक सुधार महत्वपूर्ण है । छात्रों के विकास के मापन एवं सुधारात्मक शिक्षण अधिगम के लिए सुदृढ़ उपकरण के रूप में विश्वसनीय, वैध एवं वस्तुनिष्ठ परीक्षा प्रणाली को नये रूप में विकसित करना आवश्यक है ।
प्रणाली को नये के लिए सुदृढ़ उपकरण के सपनों इस हेतु सतत् एवं व्यापक मूल्यांकन होना चाहिए । माध्यमिक स्तर पर सेमेस्टर प्रणाली एवं अंकों के स्थान पर ग्रेड प्रणाली को अपनाना उपयोगी होगा ।

अध्यापक

शिक्षक किसी भी समाज की सामाजिक-सांस्कृतिक भावनाओं का दर्पण होता है । अत: सरकार और समुदाय को शिक्षकों को रचनात्मक एवं सृजनात्मक दिशा में प्रोत्साहित एवं प्रेरित करने वाली परिस्थितियों का निर्माण करने के प्रयास करने चाहिए ।
श्रेष्ठता, वस्तुनिष्ठता एवं अनुरूपता सुनिश्चित करने के लिए शिक्षक चयन की विधियां पुनर्गठित की जायेंगी । अध्यापकों के वेतन एवं उनकी सेवा शर्ते उनकी सामाजिक एवं पेशेवर उत्तरदायित्वों के अनुरूप एवं इस पेशे के प्रति प्रतिभा को आकर्षित करने वाली होंगी । पूरे देश में शिक्षकों के लिए समान वेतन एवं सेवा शर्तों में समानता लाने के प्रयास किये जायेंगे । शिक्षकों के पदस्थापन एवं तबादलों के लिए दिशा निर्देश तैयार किये जायेंगें । शिक्षकों का खुला, सहगामी एवं समंक आधारित मूल्यांकन कर उन्हें उच्च ग्रेड में प्रोन्नति के अवसर दिये जायेंगे । शिक्षकों की अपने कार्य के प्रति जवाबदेही तय की जायेगी । शैक्षिक कार्यक्रमों के निर्माण एवं क्रियान्विति में शिक्षकों को महत्वपूर्ण भूमिका दी जायेगी ।

पेशेवर नैतिकता, मर्यादा को बनाये रखने तथा पेशेवर दुराचार को रोकने में अध्यापक संगठनों को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी ।
अध्यापक शिक्षा एक सतत् प्रक्रिया है और इसे सेवापूर्ण एवं सेवारत में पृथक नहीं किया जा सकता | प्राथमिक विद्यालय के शिक्षकों की सेवा पूर्व तथा सेवारत प्रशिक्षण एवं अनौपचारिक तथा प्रौढ़ शिक्षा के संचालन के लिए जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (DIET) की स्थापना की जायेगी । चुने हुए माध्यमिक शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालयों को राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् के पूरक के रूप में मान्यता दी जायगी ।

शिक्षा का प्रबन्धन

शिक्षा के नियोजन एवं प्रबन्ध प्रणाली में परिवर्तन को उच्च प्राथमिकता दी जायेगी । शिक्षा के लिए दीर्घकालीन योजनाएं बनाकर उन्हें राष्ट्रीय विकास और मानवीय आवश्यकताओं से संबंधित किया जायेगा विकेन्द्रीकरण, शैक्षिक संस्थानों को स्वायत्तता, जनसहभागिता, महिलाओं की सहभागिता तथा उद्देश्यों एवं मानकों के सन्दर्भ में उत्तरदायित्वों का निर्धारण आदि को शैक्षिक नियोजन एवं प्रबन्ध में स्थान दिया जायेगा शिक्षा की उचित प्रबन्ध संरचना में अखिल भारतीय सेवा के रूप में भारतीय शिक्षा सेवा (I.E.S) की स्थापना की जायेगी । शैक्षिक नियोजकों, प्रशासकों एवं संस्था प्रधानों के प्रशिक्षण पर विशेष ध्यान दिया जायेगा ।
। शैक्षिक विकास के बहुस्तरीय ढाँचे के रूप में योजना, समन्वय, निरीक्षण एवं मूल्यांकन के केन्द्र, राज्य, जिला एवं स्थानीय स्तर के अभिकरण सहभागी होंगें ।

गैर सरकारी एवं स्वेच्छिक प्रयासों को उचित प्रबन्धन एवं वित्तीय सहायता देने के लिए प्रोत्साहित किया जायेगा । साथ ही शिक्षा के व्यावसायीकरण के रूप में संस्थाओं की स्थापना को रोकने के लिए कदम उठाये जायेंगें ।

संसाधन तथा समीक्षा

दान, उपहार, शुल्क एवं सुविधाओं के अधिकतम तथा कुशल उपयोग के रूप में संसाधनों का अधिकतम विकास किया जायेगा | अनुसंधान एवं तकनीकी और वैज्ञानिक जनशक्ति के विकास में लगी हुई संस्थाएं, उन संस्थाओं से जिन्हें वे अपनी सेवाएं प्रदान कर रही है, कर अथवा शुल्क वसूली के रूप में संसाधन जुटा सकती है ।
राष्ट्रीय विकास एवं संरक्षा के लिए शिक्षा के क्षेत्र में विनियोग महत्वपूर्ण क्षेत्र होगा । आठवीं पंचवर्षीय योजना से शिक्षा में विनियोग कुल राष्ट्रीय आय का 6 प्रतिशत से अधिक सुनिश्चित किया जायेगा ।
| इस नीति के विभिन्न प्रावधानों के क्रियान्वयन की समीक्षा प्रत्येक पांच वर्ष में की जानी चाहिए । क्रियान्वयन में हुई प्रगति एवं समय समय पर दृष्टिगोचर प्रवृत्ति का पता लगाने के लिए थोड़े-थोड़े अन्तराल पर मूल्यांकन होना चाहिए ।

भावी स्वरूप

भारत में शिक्षा का भावी स्वरूप इतना जटिल होगा कि इसको ठीक-ठीक आंकना सम्भव नहीं होगा । यद्यपि हमें अपनी परम्पराओं के अनुसार मानसिक एवं आध्यात्मिक लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु अधिक ध्यान देना होगा ।

 

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