वुड़ के घोषणा पत्र क्या है? और इसके क्या उद्देश्य थे ?

वुड़ के घोषणा पत्र क्या है? और इसके क्या उद्देश्य थे ?

भारतीय शिक्षा के इतिहास में सन् 1833 से 1853 की अवधि को शिक्षा के अंग्रेजीकरण की अवधि कहा जाता है । जिसमें अंग्रेजी के माध्यम से पाश्चात्य शिक्षा के प्रसार को सरकारी शिक्षा-नीति बनाया गया । इस नीति को व्यावहारिक रूप प्रदान करने के लिए “लोक शिक्षा समीति” ने अंग्रेजी की शिक्षा प्रदान करने वाली संस्थाओं का नव निर्माण किया ।। । सन् 1853 में कम्पनी के “आज्ञा-पत्र’ के नवनीकरण का अवसर आया तब यह महसूस किया जाने लगा कि भारतीय शिक्षा में आमूल चूल परिवर्तन किया जाए । इसलिए ब्रिटिश संसद ने एक संसदीय समीति (Select Committee of the house of commons ) का गठन किया । जिसमें आधारभूत सिद्वान्तों के आधार पर 1854 में शिक्षा सम्बन्धी एक घोषणा-पत्र प्रस्तुत किया जिसे वुड का “घोषणा-पत्र कहा जाता है ।
इस घोषणा पत्र में तत्कालीन शिक्षा के पुनरीक्षण तथा भविष्य में शैक्षिक पुनर्निर्माण हेतु एक सुनिश्चित बहुआयामी तथा दीर्घकालीन नीति को सूचीबद्ध करने का प्रयास किया गया । यह सौ अनुच्छेदों का लम्बा लेख पत्र है जिसमें भारतीय शिक्षा के सभी पक्षों पर विचार के साथ-साथ शिक्षा व्यवस्था को एक नया मोड़ दिया गया । इसलिए इसकी विस्तृत विवेचना उपयुक्त ही प्रतीत होती है । इस घोषणा-पत्र की मुख्य विशेषताएँ, घोषणा के उद्देश्य, घोषणा पत्र का मूल्यांकन जिसके अन्दर गुण दोष व घोषणा की सार्थकता की विस्तृत विवेचना यहां प्रस्तुत की जा रही है।

वुड़ के घोषणा पत्र के उद्देश्य

वुड़ के घोषणा पत्र के निम्नांकित उद्देश्य हैं

1. भारतीय शिक्षा व्यवस्था को एकरूपता प्रदान करना ।

2. शिक्षा संस्थाओं के लिए सहायता अनुदान प्रणाली प्रारम्भ करना ।

3. प्रत्येक प्रान्त में शिक्षा विभाग की स्थापना करना ।

4. ईस्ट इण्डिया कम्पनी के लिए विश्वसनीय और योग्य कर्मचारी तैयार करना ।

5. शिक्षा व्यवस्था का पूर्ण उत्तरदायित्व कम्पनी का मानना ।

6. यूरोपीय ज्ञान-विज्ञान का प्रचार-प्रसार करना ।

7. सम्पूर्ण देश में शिक्षा संस्थाओं की स्थापना करना ।

8. महिला शिक्षा को प्रोत्साहित करना ।।
9. भारतीयों का भौतिक व नैतिक विकास करना ।

वुङ-पत्र के “घोषणा-पत्र” सुझाव व सिफारिशे

वुइ “घोषणा पत्र में शिक्षा-सम्बन्धी की गई सिफारिशों का वर्णन नीचे दिया जा रहा है1. शिक्षा का उत्तरदायित्व
| वुड के “घोषणा-पत्र में आवश्यक शिक्षा को सरकार का दायित्व स्वीकार करते हुए कहा गया है कि “कोई भी अन्य विषय हमारा ध्यान इतना अधिक आकर्षित नहीं कर सकता हैं। जितना की शिक्षा । यह हमारा पुनीत कर्तव्य है कि भारत के निवासियों को उस नैतिक तथा भौतिक समृद्धि से युक्त करें जो उपयोगी ज्ञान के सामान्य विस्तारण से फैलती है, तथा जो भारत में इंग्लैण्ड से अपने सम्बन्धों के कारण प्राप्त कर सकता है ।

2. शिक्षा का उद्देश्य

भारत में नागरिकों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों तथा ब्रिटिश घरानों के हित संवर्धन की दृष्टि से शिक्षा के उद्देश्यों की चर्चा करते हुए घोषणा-पत्र में स्पष्ट किया गया है कि
(A) भारतीयों में शिक्षा का प्रसार करके उनकी बौविक व चारित्रिक उन्नति करना ।

(B) भारतीयों में यूरोप की विकसित कलाओं, विज्ञान, दर्शन तथा साहित्य का प्रसार करना।

(C) भारतीयों की राजपदों के लिए सुयोग्य कर्मचारी तैयार करना ।
(D) भारतीयों को समृद्ध बनाना व ब्रिटिश कामगारों द्वारा उत्पादित वस्तुओं की मांग बनाये रखना ।

वुड के “घोषणा पत्र में भारतीयों के नैतिक व भौतिक विकास के लिए आवश्यक शिक्षा को सरकार का दायित्व स्वीकार करते हुए कहा गया कि –
“कोई भी अन्य विषय हमारा ध्यान इतना अधिक आकर्षित नहीं कर सकता हैं जितना कि शिक्षा | यह हमारा एक पुनीत कर्तव्य है कि भारत के निवासियों को उस नैतिक तथा भौतिक समृद्धि से युक्त करें जो उपयोगी ज्ञान के सामान्य विस्तारण से फैलती है तथा जो भारत में इंग्लैण्ड से अपने सम्बन्धों के कारण प्राप्त कर सकता है ।” “Amoung many subjects of importance , none can be stronger claim to our attention than that of education .It is one of our most sacred duties to be the means of conferring upon the general diffusion of useful knowledge and which India may derive from her connection with England”

भारत में नागरिकों व्यापारिक प्रतिष्ठानों तथा ब्रिटिश घरानों के हित संवर्धन की दृष्टि से शिक्षा के उद्देश्यों की चर्चा करते हुए घोषणापत्र में स्पष्ट किया गया कि”शिक्षा का उद्देश्य बौविक व चारित्रिक उन्नति करना, राजपदों के लिए सुयोग्य कर्मचारी तैयार करना, भारतीयों को समृद्ध बनाना तथा ब्रिटिश उत्पादकों व जनता के उपभोग के लिए आवश्यक वस्तुओं की पूर्ति सुनिश्चित करने के साथ-साथ ब्रिटिश कामगारों द्वारा उत्पादित वस्तुओं की मांग बनाये रखना था ।”

We have always looked upon the encouragement of education not only to produce a higher degree of intellectual fitness, but to raise the moral character of those who partake of its advantage , and so to supply you with servants of whose profity you may with increased confidence commit offices of trust .This (European) Knowledge will teach the natives of India the marvelous results of the employment of labour and capital , rouse them to emulate us in the development of the vast resources of their country , confer upon them all advantage which accompany the healthy increase of wealth and commerce, and at the same times, secure to us a large and more certain supply of many articles necessary for our manufacture and extensively consumed by all classes of our population , as well as an almost inexhaustible demand for the produce of British labour.” ]

शैक्षिक उद्देश्यों के परिप्रेक्ष्य में भारतीय शिक्षा प्रणाली के पाठ्यक्रम के सम्बन्ध में चर्चा करते हुए उन्होनें कहा कि “हम भारत में ऐसी शिक्षा का प्रसार देखना चाहते हैं जिसका उद्देश्य यूरोप की विकसित कलाओं, विज्ञान, दर्शन तथा साहित्य अर्थात् यूरोपीय ज्ञान का प्रसार करना हो ।” हत्य अर्थात् यूरोपीय ज्ञान का प्रसार करना हो ।’

3. पाठ्यक्रम

वुड़ के आदेश पत्र में भारतीय भाषाओं के साहित्य को ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानते हुए पाठ्यक्रम में स्थान दिया गया | परन्तु पाश्चात्य साहित्य एवं विज्ञानों का अध्ययन ही भारतीयों के लिए उपयुक्त समझा जाएँ ।

4. शिक्षा का माध्यम

आदेश पत्र में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी व देशी भाषाओं को स्वीकार किया गया । अंग्रेजी का माध्यम केवल उन व्यक्तियों के लिए होगा, जो इस भाषा का समुचित ज्ञान रखते हो और अन्य के लिए देशी भाषाओं को शिक्षा का माध्यम निश्चित किया गया ।

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