विश्वविद्यालयों में स्नातकोत्तर शिक्षण और अनुसंधान कार्य को सफल बनाने सेंडलर आयोग ने क्या क्या सुझाव दिये?

विश्वविद्यालयों में स्नातकोत्तर शिक्षण और अनुसंधान कार्य को सफल बनाने सेंडलर आयोग ने क्या क्या सुझाव दिये?

आयोग ने पाठ्यक्रम के बारे में निम्न सुझाव दिए हैं।

1. स्नातक कक्षाओं में उन्हीं को प्रवेश दिया जाए जो 12 वर्ष तक स्कूल में या इसके । समकक्ष किसी अन्य संस्था में सफलतापूर्वक शिक्षा प्राप्त कर चुके हों ।।

2. स्नातक उपाधि प्राप्त करने के लिए अध्ययन की अवधि 3 वर्ष होनी चाहिए |

3. स्नातकोत्तर उपाधि आनर्स कोर्स के बाद और स्नातक बनने के 2 वर्ष बाद दी जाए ।

4. विश्वविद्यालयों एवं माध्यमिक विद्यालयों को सामान्य शिक्षा के सिद्धान्तों एवं व्यापार का अध्ययन प्रारम्भ करना चाहिए ।

5. छात्र की सामान्य रूचियों को ध्यान में रखकर प्रत्येक क्षेत्र के लिए सामान्य और विशिष्ट शिक्षा में सम्बन्ध स्थापित किया जाना चाहिए ।
आयोग ने पाठ्यक्रम के बारे में जो बताया है उससे लक्ष्यों की प्राप्ति आवश्यक है ।

पाठ्यक्रम में सामान्य, उदार और व्यावसायिक तीनों प्रकार की शिक्षा को स्थान दिया जाना बहुत उचित है ।

इसी आधार पर 9वीं कक्षा से स्नातक तक की कक्षाओं के लिए पाठ्यक्रम निर्धारित किये गए है । ये पाठ्यक्रम काफी विस्तृत है ।

आयोग के पाठ्यक्रम संबंधित सुझावों में भी दोष हैं । इसमें विषयों की संख्या पर बहुत अधिक ध्यान दिया गया है |

9 वीं से 12 वीं कक्षा तक सामान्य विज्ञान के अन्तर्गत केवल भौतिक

10. सेवानिवृति की आयु सामान्यता 60 वर्ष होनी चाहिए किन्तु प्रोफेसर के सम्बन्ध में आयु 64 वर्ष तक वृद्धि की अनुमति होनी चाहिए ।

11. शिक्षकों को अध्ययन हेतु एक बार में एक वर्ष और पूर्ण सेवा अवधि में 3 वर्ष का अवकाश आधे वेतन पर दिया जाना चाहिए ।

12. शिक्षकों को एक सप्ताह में अधिक से अधिक 18 घण्टे का शिक्षण कार्य दिया जाना चाहिए । इसमें ट्यूटोरियल कार्य के घण्टे भी शामिल हो । मास्टर डिग्री कक्षाओं और शोध छात्रों के निर्देशक शिक्षकों के लिए 12 से 15 घण्टे हो । 

13. शिक्षकों की नियुक्ति में योग्यता को आधार बनाया जाना चाहिए, जिसमें शिक्षक की शैक्षिक, शिक्षण एवं छात्र-क्रियाओं में नेतृत्व की योग्यता शामिल हो ।
आयोग ने शिक्षकों के बारे में अति उत्तम विचार व्यक्त किए | उसने शिक्षकों के महत्व को स्वीकार करने की बात की तथा उन्हें आदरणीय स्थान दिलाने का प्रयास किया । उसने शिक्षको के महत्व को स्वीकार करने की बात की तथा उन्हें आदरणीय स्थान दिलाने का प्रयास किया । पर यह तभी सम्भव है- जब देश, सरकार और समाज के दवारा उनके महत्व को स्वीकारा जाए । लेकिन आज का युग भौतिकवादी युग है, लक्ष्मी की उपासना की जाती है । जो व्यक्ति धनी है- वह योग्य, बुद्धिमान, गुणवान सभी कुछ समझा जाता है । अत: यह आवश्यक था कि अध्यापक के महत्व में वृद्धि करने के लिए उसके वेतन और अधिकारों में वृद्धि की जाए । इस बात पर आयोग ने ध्यान नहीं दिया है । उसने लेक्चरर के लिए मात्र 200 रू मासिक वेतनमान की बात की है जो उनका स्थान समाज में नीचे कर देता है । महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों ने आयोग के इस विचार को तो मान लिया परन्तु अन्य बातों पर ध्यान नहीं दिया । जिससे शिक्षकों में असंतोष पनप गया ।

अध्ययन के स्तर

आयोग ने शिक्षण, परीक्षा एवं प्रायोगिक कार्य के स्तर में सुधार के लिए निम्नलिखित संस्तुतियाँ प्रस्तुत की हैं –

1. विश्वविद्यालय स्तर के कोर्स के लिए प्रवेश का स्तर वर्तमान इन्टरमीडिएट परीक्षा के समकक्ष होना चाहिए ।

2. प्रत्येक प्रान्त में उचित शिक्षण साधनों एवं शिक्षण वर्ग से युक्त इन्टरमीडिएट कॉलेजों की अधिक संख्या में स्थापना होनी चाहिए ।

3. 10 से 12 वर्षीय स्कूली शिक्षा की समाप्ति पर छात्रों को विभिन्न व्यवसायों में स्थानान्तरित करने के लिए व्यवसायिक संस्थान अधिक संख्या में खोले जाने चाहिए ।

4. हाईस्कूल और इन्टरमीडिएट कॉलेजों के शिक्षकों के लिए विश्वविद्यालयों द्वारा अभिनवन पाठ्यक्रमों की व्यवस्था की जानी चाहिए ।

5. विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में छात्रों की भीड़ को रोकने के लिए शिक्षण विश्वविद्यालयों के कला एवं विज्ञान संकायों में छात्रों की अधिकतम संख्या 3000 और सम्बद्ध कॉलेजों में 1500 निर्धारित की जानी चाहिए ।

6. अध्ययन के किसी कोर्स के लिए निर्धारित पाठ्य-पुस्तकें न हो । और जैविक विज्ञानों को ही स्थान दिया गया है । वास्तव में इसमें रसायन शास्त्र और वनस्पति शास्त्र को भी स्थान दिया जाना आवश्यक था ।

स्नातकोत्तर प्रशिक्षण एवं अनुसंधान ।

आयोग ने विश्वविद्यालयों में स्नातकोत्तर शिक्षण और अनुसंधान कार्य को सफल बनाने के लिए निम्न सुझाव दिये

1. स्नात्तकोतर की उपाधियों के लिए नियमों में एकरूपता होनी चाहिए ।

2. ये उपाधियाँ, साधारण स्नातक को कम से कम 2 वर्ष बाद, ‘ऑनर्स स्नातक’ को कम से कम एक वर्ष बाद दी जाए ।

3. प्रत्येक विश्वविद्यालय में इन पाठ्यक्रमों में प्रवेश अखिल भारतीय स्तर पर होने  चाहिए। शिक्षकों और छात्रों के मध्य घनिष्ठ वैयक्तिक सम्पर्क होना चाहिए ।

4. पी०एच०डी० उपाधि के लिए प्रशिक्षण कम से कम दो वर्ष कर देना चाहिए | एक पी०एच०डी० छात्र को संकीर्ण विशेषज्ञ नहीं होना चाहिए वरन् अपने विषय को आत्मसात करने की अपनी गहन विशेषता होनी चाहिए | विषय के समस्त क्षेत्र में शोध प्रबन्ध और मौखिक परीक्षा सम्मिलित होनी चाहिए । पी0एच0डी0 कोर्स में प्रवेश अधिक सतर्कता से अखिल भारतीय स्तर पर होने चाहिए ।

5. इन उपाधियों के लिए शिक्षण की व्यवस्था नियमित व्याख्यानों, गोष्ठियों और प्रयोगशाला- कार्य के द्वारा की जाए ।

6. इनके पाठ्यक्रमों में एक विशिष्ट विषय का उच्च अध्ययन और अनुसंधान – विधियों | का प्रशिक्षण सम्मिलित किया जाए ।

7. पी0एच0डी0 की परीक्षा में ‘थीसिस’ के साथ-साथ मौखिक परीक्षा को भी सम्मिलित किया जाए ।

8. जो छात्र पी0एच0डी0 की उपाधि लेने के बाद अनुसंधान कार्य करना चाहते है, उनके लिए प्रत्येक विश्वविद्यालय में कुछ अनुसंधान अभिवृतियाँ रखी जाए ।

9. डी.लिट. और डी.एस.सी. की उपाधियाँ उत्कृष्ट मौलिकता और विशिष्ट कोटि के | प्रकाशित कार्य पर ही प्रदान की जानी चाहिए ।

10. विश्वविद्यालय शिक्षकों को अपने शिक्षण कार्य के संबंध में सामुदायिक समयनिष्ठता कार्यकुशलता और कर्तव्यनिष्ठता तथा अपने अनुसंधान कार्य के संबंध में नवीन विचार
और नवीनतम विधियाँ प्रदान करनी चाहिए ।

11. वैज्ञानिकों को अधिक संख्या में प्रशिक्षित किया जाना आवश्यक है, जिससे हम उच्चकोटि की योग्यता के कुछ व्यक्ति प्रदान कर सकें ।।

12. शिक्षा मंत्रालय द्वारा एम.एस.सी. और पी.एच.डी. के छात्रों को बड़ी संख्या में छात्रवृतियां दी जाएं । इन छात्रों का चुनाव करने के लिए एक संस्था का निर्माण किया जाएं ।
आयोग ने स्नातकोत्तर प्रशिक्षण और अनुसंधान के लिए अति व्यापक और महत्वपूर्ण सुझाव दिए । वस्तुतः इन दोनों क्षेत्रों में हमारा देश बहुत पिछड़ा हुआ है । इसमें प्रगति हुए बिना हमारे देश का विकास असम्भव है ।

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