विश्वविद्यालयों को अपने प्रशासन एवं संगठन के लिए किन किन विधियों का सहारा लेना पड़ता है?

विश्वविद्यालयों को अपने प्रशासन एवं संगठन के लिए किन किन विधियों का सहारा लेना पड़ता है?

यद्यपि बड़े आकार के कॉलेजों को प्रोत्साहित किया जाये, परन्तु छोटे आकार के कॉलेज भी आवश्यकतानुसार स्थापित किये जाये । बिना यू.जी.सी. की सलाह के कोई भी नया विश्वविद्यालय स्थापित न किया जाये ।

(iv) पत्र-व्यवहार (Correspondence) तथा सांयकालीन कॉलेजों के माध्यम विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की अंशकालीन शिक्षा दी जाये ।

(i) विश्वति
 उच्च शिक्षा में स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए स्त्रियों के लिए छात्रवृत्तियां, निःशुल्क शिक्षा स्नातक स्तर पर पृथक कॉलेज तथा अधिस्नातक स्तर पर सह शिक्षा, स्त्रियों के लिए गृहविज्ञान नर्सिग, समाज शास्त्र आदि विषयों की सुविधा आदि की व्यवस्था की जाये ।

इस प्रकार आयोग ने उच्च शिक्षा के लिए योग्य एवं उपयुक्त विद्यार्थियों के चयन की बात कहकर इस स्तर पर अनावश्यक भीड़ से बचने का महत्वपूर्ण सुझाव दिया, साथ ही अंशकालीन शिक्षा व्यवस्था और स्त्री शिक्षा को बढ़ाना देने संबंधी सुझाव देकर समाज के विकास में इनकी भूमिका को महत्वपूर्ण माना है ।। 

विश्वविद्यालयों का प्रशासन

आयोग का मानना है कि विश्वविद्यालयों को अपने प्रशासन एवं संगठन के लिए उपयोगी विधियों का विकास करना चाहिए, जिनके लिए यू.जी.सी. उनकी सहायता करें । विश्वविद्यालयों के प्रशासन एवं संगठन से संबंधित आयोग के सुझाव इरा प्रकार है :
विश्वविद्यालयों की सम्प्रभुता (Autonomy) अध्यापकों की नियुक्ति, प्रगति, पाठ्यक्रम, शिक्षण विधि, छात्रों के प्रवेश तथा परिस्थितियों में निहित होती है । विश्वविद्यालयों को अपनी सम्प्रभुता बनाये रखने के प्रयास करते रहना चाहिए । प्रत्येक कॉलेज के प्रत्येक विभाग में शिक्षकों एवं छात्रों की संयुक्त समितियाँ बनाई जायें । योग्य एवं अनुभवी व्यक्ति को उप- कुलपति (Vice-Chanceller) के रूप में पूर्णकालीन रूप में नियुक्ति की जाये । इसे पर्याप्त शक्तियाँ प्राप्त होनी चाहिए ।

(iv) विश्वविदयालय की आन्तरिक व्यवस्था के लिए उप कुलपति की अध्यक्षता में एक कार्यकारिणी परिषद् (Executive Council) गठित की जानी चाहिए । पाठ्यक्रम तथा स्तर निर्धारण के लिए शिक्षा परिषद (Academic Council) एक मात्र संस्था हो ।

(vi) विश्वविद्यालय एवं राज्य सरकार के परामर्श से ही कॉलेजों को सम्बद्धता (Affiliation) दी जानी चाहिए |

(vii) सभी विश्वविद्यालय अन्तर-विश्वविद्यालय परिषद् (Inter University Council) के सदस्य होने चाहिए तथा सदस्य विश्वविद्यालयों की उपाधियाँ सभी जगह मान्य होनी चाहिए |

(viii) यू.जी.सी. को सभी प्रकार की उच्च शिक्षा का प्रतिनिधित्व करना चाहिए । 

इस प्रकार आयोग ने विश्वविद्यालयों के प्रशासन एवं संगठन हेतु उन्हें सम्प्रभुता देने तथा विश्वविद्यालयों पर यू.जी.सी. के द्वारा पर्याप्त नियंत्रण एवं पर्याप्त वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने सम्बन्धी महत्वपूर्ण सुझाव दिये । साथ ही यह भी कहा कि कृषि, इंजीनियरिंग एवं चिकित्सा शिक्षा के विकास के लिए यू.जी.सी. जैसे संगठन स्थापित किये जायें ।

 कृषि की शिक्षा

भारत कृषि प्रधान देश रहा है । यही की अधिकांश जनसंख्या कृषि कार्यों में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार प्राप्त कर रही है | यदि कृषि उन्नत तरीकों से की जाती है तो यह देश में उत्पादन एवं उत्पादकता को बढ़ाने में सहायक होगा । इस दृष्टि से आयोग ने भारत में कृषि की शिक्षा के लिए निम्नलिखित सुझाव दिये 😐 (i) अनुसंधान, प्रशिक्षण एवं प्रसार के लिये प्रत्येक राज्य में एक कृषि विश्वविद्यालय स्थापित किया जाये ।।

(ii) नये कृषि कॉलेजों की स्थापना न करके स्नातक एवं स्नातकोत्तर अध्ययन कृषि
विश्वविद्यालयों में ही हो ।

(iii) अन्य विश्वविदयालय यदि कृषि को अपने पाठ्यक्रम में सम्मिलित करना चाहें तो उन्हें
इसके लिए सभी प्रकार की सहायता दी जाये । कृषि पॉलिटेक्निक संस्थाओं की स्थापना कर माध्यमिक शिक्षा के बाद की कृषि शिक्षा की व्यवस्था की जाये, ये संस्थान कृषि विश्वविद्यालय से सम्बद्ध होने चाहिए । विद्यालयों में प्राथमिक स्तर पर कृषि से संबंधित सामान्य जानकारी देनी चाहिए । साथ ही विद्यालय स्तर पर कृषि शिक्षा कार्यानुभव पर आधारित हो । कृषि शिक्षा के प्रसार के लिए किसानों, ग्राम सेवकों आदि की सहायता लेनी चाहिए तथा ग्रामीण समुदाय एवं किसानों को शिक्षित करने के लिए रेडियो, फिल्मों तथा अन्य श्रव्य-दृश्य सामग्री की सहायता लेनी चाहिए ।

इस प्रकार आयोग ने कृषि शिक्षा के प्रचार प्रसार हेतु औपचारिक शिक्षा एवं अनौपचारिक शिक्षा दोनों के सुझाव दिये । कृषि विश्वविद्यालयों में कृषि शिक्षा के शिक्षण, प्रशिक्षण, अनुसंधान आदि के आधार पर कृषि को उन्नत बनाने के सुझाव दिये ।

व्यावसायिक, प्राविधिक एवं इंजीनियरिंग की शिक्षा

वर्तमान में किसी राष्ट्र की उन्नति का मूल आधार है वहां की औद्योगिक उन्नति तथा औद्योगिकीकरण । औद्योगिक विकास में मानवीय साधनों के समुचित उपयोग के लिए उसका वैज्ञानिक एवं तकनीकी रूप से कुशल एवं दक्ष होना आवश्यक है अत: वर्तमान भारत के लिए यहां के व्यक्तियों को तकनीकी रूप से शिक्षित एवं प्रशिक्षित होना आवश्यक है । इस संबंध में कोठारी आयोग ने व्यावसायिक व तकनीकी शिक्षा को आवश्यक मानते हुए व्यावसायिक, तकनीकी एवं इंजीनियरिंग की शिक्षा के विषय में निम्नलिखित सुझाव दिये :

(i) अर्द्ध कुशल और कुशल कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण के लिए प्रशिक्षण संस्थानों का विस्तार किया जाये एवं उनमें सुविधाएं बढ़ाई जाये ।
वाणिज्यिक, लिपिकीय एवं वैज्ञानिक शिक्षा कक्षा 11 व 12 में दी जाये एवं लड़कियों | की रूचि एवं स्वभाव का ध्यान रखते हुए उन्हें गृहविज्ञान, नर्सिंग एवं सामाजिक कार्यों
की शिक्षा दी जाये पोलोटेक्नीक से निकले हुए छात्रों को अपना व्यवसाय चलाने के लिए प्रोत्साहित किया जाये ।

(iv) इंजीनियरिंग के पाठ्यक्रमों में भिन्नता हो तथा इलेक्ट्रोनिक जैसे विषय में बी.एस.सी. को प्रवेश दिया जाये । वर्कशॉप प्रेक्टिस में उत्पादन कार्य पर अधिकाधिक बल दिया जाये ।

(vi) अध्यापकों को उद्योगों में परामर्श देने की अनुमति दी जाये ।

(vii) प्रशिक्षण देने हेतु अच्छे यंत्रों का उपयोग किया जाये ।

(viii) व्यावसायिक शिक्षा का माध्यम क्षेत्रीय भाषा हो । (ix) शिक्षा के प्रसार हेतु डाक द्वारा शिक्षा की व्यवस्था की जाये ।।

(x) यू.जी.सी. की तर्ज पर तकनीकी शिक्षा के लिए एक संगठन बनाया जाना चाहिए ।

(xi) आई.आई.टी. जैसे संस्थानों को विश्वविद्यालयों का स्तर प्रदान किया जाये ।।
इस प्रकार आयोग ने अच्छे इंजीनियर, कुशल एवं अर्द्धकुशल कार्यकर्ता तैयार करने के लिए प्रशिक्षण पर बल दिया । इंजीनियरिंग के विभिन्न प्रकार के पाठ्यक्रम चलाने की बात कही तथा प्रशिक्षण संस्थाओं एवं सफलता के लिये यू.जी. सी. की तर्ज पर संगठन बनाने का सुझाव दिया ।

विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान 

राष्ट्र की प्रगति एवं कल्याण के लिए वर्तमान समय में विज्ञान की शिक्षा एवं अनुसंधान का गुणात्मक होना अति आवश्यक है । इसी बात को दृष्टिगत रखकर आयोग ने विज्ञान की शिक्षा एवं अनुसंधान सम्बन्ध में निम्न सुझाव दिये
(i) विज्ञान की शिक्षा के लिए सर्वोत्तम छात्रों का ही चयन किया जाये ।

(ii) स्नातकोत्तर स्तर की शिक्षा तथा अनुसंधान के लिए विषयों का चयन सावधानीपूर्वक

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