सैडलर आयोग के गठन के प्रमुख कारण क्या थे

सैडलर आयोग के गठन के प्रमुख कारण क्या थे

विज्ञान, इंजीनियरिंग, चिकित्सा, वाणिज्य आदि विषय पढ़ाए जायें ।

3. इन्टरमीडिएट कॉलेज या तो स्वतंत्र रूप से अलग चलाए जाएँ, या इन कॉलेजों की कक्षाओं को चुने हुए हाई स्कूलों से सम्बद्ध कर दिया जाये ।

4. विश्वविद्यालयों में उन्हीं विद्यार्थियों को प्रवेश दिया जाये, जो इन्टरमीडिएट परीक्षा पास कर चुके हों ।

5. इन्टरमीडिएट कक्षाओं को विश्वविदयालयों से अलग कर दिया जाय ।।

6. बी.ए. का कोर्स 3 वर्ष का कर दिया जाय ।

7. माध्यमिक विद्यालयों में अंग्रेजी और गणित के अलावा सब विषयों का शिक्षण भारतीय भाषाओं में किया जाय ।

8. इन्टरमीडिएट कॉलेजों में सेमिनारों (Seminars) और ट्यूटोरियल कक्षाओं (Tutorial Classes) की व्यवस्था की जाय ।

6. डी. जियाउद्दीन अहमद

सरकार ने आयोग से अपेक्षा की थी कि वह अन्य भारतीय विश्वविद्यालयों का अध्ययन करें एवं उनके समग्र सुधार की दिशा में सुझाव दें । इस कमीशन पर कलकत्ता विश्वविद्यालय को तत्कालीन परिस्थिति का अध्ययन करने तथा उसके सुधार के उपाय बतलाने का भार सौंपा गया । कमीशन को तुलनात्मक अध्ययन के लिए अन्य विश्वविद्यालयों का भी निरीक्षण करने का अधिकार मिला ।
। आयोग का कार्यक्षेत्र और जांच का विषय इस प्रकार था – “कलकत्ता विश्वविदयालय की स्थिति और आवश्यकताओं की जांच करना और उसके द्वारा उपस्थित प्रश्न (स्नातकोत्तर शिक्षा) पर रचनात्मक नीति का सुझाव देना ।”
“To enquire into the conditions and prospects of the University of Calcutta and to consider the question of a constructive policy in relation to the question it presents.” । आयोग की नियुक्ति केवल कलकत्ता विश्वविद्यालय की जाँच करने के लिए की गई। थी, पर उसको यह अधिकार दे दिया गया था । कि वह तुलनात्मक अध्ययन करने के लिए दूसरे विश्वविदयालयों की भी जांच कर सकता था ।

स्वमूल्यांकन प्रश्न

2. सैडलर आयोग के प्रमुख सदस्य कौन थे |
12.4 आयोग का परिवेदन
आयोग ने लगभग 17 माह तक निरन्तर परिश्रम करने के बाद मार्च, 1919 में अपनी रिपोर्ट पेश की । ‘रिपोर्ट बहुत बड़ी है और 13 भागों में बंटी हुई है । उसमें माध्यमिक, ಹೆತ್ತ , HeadPI, MIGHT 3 FRTET 3ಾಹ 3 ತT da T THI है और उनके बारे में रचनात्मक सुझाव भी दिए गए है । 12.5 आयोग की सिफ़ारिशें और सुझाव
आयोग ने शिक्षा के जिन अंगों के बारे में अपने विचार व्यक्त किए, उनका वर्णन नीचे दिया जा रहा 1. माध्यमिक शिक्षा के दोष
आयोग ने माध्यमिक शिक्षा को उच्च शिक्षा का आधार माना ।इसलिये आयोग का fazlIN 9T f Is a HTCzfa fale * 1 * 47 * 3A+ AT SHIHI al qal[ दिया जायेगा, तब तक विश्वविद्यालय शिक्षा में किसी प्रकार का सुधार न हो सकेगा । आयोग ने माध्यमिक शिक्षा के निम्नलिखित दोष बताए – 1. माध्यमिक शिक्षा का काफी विकास हुआ है, पर उसकी गुणात्मक (Qualitative) उन्नति नहीं हुई है ।

9. प्रत्येक प्रान्त में ‘माध्यमिक शिक्षा परिषद् (Board of Secondary & Intermediate Education) स्थापित की जाय । 10. ये परिषदें पाठ्यक्रम बनाएँ, हाई स्कूल और इन्टर की परीक्षाएँ ले, हाई स्कूलों और इन्टरमीडिएट कॉलेजों को मान्यता प्रदान करें ।

11. ये परिषदें स्वतंत्र इकाइयाँ हों और इनको सरकारी हस्तक्षेप और शिक्षा विभाग के नियन्त्रण से मुक्त रखा जाय ।

12. इनकी प्रबन्धकारिणी समिति में सरकार, विश्वविद्यालय, इन्टरमीडिएट कॉलेजों और हाई स्कूलों के प्रतिनिधि रखे जाये ।।
निष्कर्ष रूप में आयोग ने माध्यमिक शिक्षा के जिन दोषों की ओर संकेत किया, उनको अस्वीकार नहीं किया जा सकता । ‘सहायता-अनुदान’ मिलने के कारण माध्यमिक विद्यालयों की स्थापना अति तीव्र गति से हुई थी । पर इनको चलाने के लिए केवल ‘सहायता अनुदान’ से प्राप्त धनराशि काफी नहीं थी । इनकी प्रबन्धकारिणी समितियों के सदस्य इतना धन जमा नहीं कर पाते थे कि स्कूलों को कुशलता से चला सकें । फलत: शिक्षण का स्तर निम्न होना स्वाभाविक था । धनाभाव के कारण शिक्षकों को उचित वेतन नहीं दिया जा सकता था, जिसके कारण योग्य व्यक्ति स्कूलों के अध्यापक बनना पसन्द नहीं करते थे । इसी प्रकार माध्यमिक शिक्षा के जो अन्य दोष आयोग ने बताए, वे सभी ठीक थे । आयोग ने इसके बारे में अति प्रशंसनीय सुझाव दिए ।
इन्टरमीडिएट कॉलेजों की स्थापना का सुझाव बिल्कुल नया था । यह सुझाव केवल इसलिए दिया गया था, जिससे माध्यमिक शिक्षा के स्तर को ऊँचा उठाया जा सके । दूसरा, प्रशंसनीय सुझाव था – ‘माध्यमिक शिक्षा-परिषदों’ की स्थापना । उस समय मेट्रीकुलेशन की परीक्षा का भार विश्वविद्यालयों पर था, जिससे उनका बहुत समय नष्ट होता था । आयोग चाहता था । कि उनका यह समय बचे और साथ ही वे माध्यमिक शिक्षा के भार से मुक्त भी हो जायें । ऐसा होने से वे अपने ध्यान को उच्च शिक्षा पर केन्द्रित कर सकेंगे, जिससे उनका स्तर ऊँचा उठेगा ।।

2. कलकत्ता विश्वविद्यालय सम्बन्धी सुझाव

आयोग की नियुक्ति विशेष रूप से कलकत्ता विश्वविद्यालय की स्थिति की जांच करने के लिए हुई थी । अतः आयोग ने इस कार्य को बड़ी सतर्कता से किया । उसने पहले तो विश्वविद्यालय के दोष बताए, और फिर उन दोषों को दूर करने के उपाय, हम इन पर नीचे प्रकाश डाल रहे हैं –

(अ) कलकत्ता विश्वविद्यालय के दोष

1. विश्वविद्यालय में छात्रों की संख्या अधिक है । केवल उपाधियों के लिए प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों की संख्या 26,000 है । इतनी बड़ी संख्या पर नियन्त्रण रखना, विश्वविद्यालय की क्षमता से बाहर की बात है ।

2. विश्वविद्यालय से सम्बद्ध कॉलेजों में साहित्यिक विषयों की शिक्षा दी जाती है, जो छात्रों को केवल प्रशासन, क्लर्की, शिक्षण और वकालत के लिए तैयार करती है ।
3. इन कॉलेजों में शिक्षण-सामग्री और उपयोगी साधनों का अभाव है ।

4. अधिकांश शिक्षकों का वेतन कम है । इसके अतिरिक्त उनको कार्य करने की स्वतन्त्रता नहीं है ।

5. शिक्षण-व्यवसाय को किसी प्रकार की प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं है । अत: योग्य व्यक्ति इसकी ओर आकर्षित नहीं होते हैं । 6. शिक्षा देने के लिए परम्परागत और नीरस विधियों का प्रयोग किया जाता है ।

7. विश्वविद्यालय की शासन पद्धति और व्यवस्था बहुत ही प्रभावहीन और असन्तोषजनक है । यह व्यवस्था ज्ञान के प्रसार के लिए तनिक भी हितकर नहीं है ।।

8. विश्वविद्यालय पर प्रशासकीय कार्यों का भार बहुत अधिक है ।

(ब) दोषों को दूर करने के उपाय
1. ढाका में शीघ्र ही ‘एकात्मक शिक्षण-विश्वविद्यालय’ (Unitary Teaching | University) स्थापित किया जाय ।।

2. कलकत्ता नगर की शिक्षा-संस्थाओं का इस प्रकार संगठन किया जाय कि कलकत्ता में

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