डेल्फी विधि (Delfi-technique) क्या है, और इसका शिक्षण मे क्या योगदान है ?

 

डेल्फी विधि (Delfi-technique) क्या है, और इसका शिक्षण मे क्या योगदान है ?

तथा क्या घटित होना वह पसन्द करेगा । ऐसा प्रयास निःसन्देह उस व्यक्ति में भविष्य के प्रति जागरूकता व चेतना विकसित करेगा ।
2. डेल्फी विधि (Delfi-technique) इसमें किसी माध्यम (अन्य व्यक्ति) की सहायता से विशेषज्ञों सम्मतियां एकत्र की जाती हैं । उन सम्मतियां को गुमनाम ढंग से वापिस उन्हीं विशेषज्ञों में वितरित किया जाता है । लगातार कई बैठकों में उन सम्मतियां पर विचार-विमर्श (बिना किसी सम्मति दाता का नाम बताये) होता है और, अन्त में इस प्रकार से समूह की सहमति विकसित की जाती है, जिसे भविष्य की गंभीर संभावना माना जाता है । इस विधि से भी भविष्यचेतना का विकार किया जाता है । इन के अतिरिक्त शिक्षासंस्थाओं में शिक्षक विविध प्रकारों से विद्यार्थियों में भविष्य के प्रति चेतना या जागृति विकसित कर सकते है ।।

3. भविष्य से संबंधित पाठ्येतर क्रियाओं का आयोजन (Organization of co curricular activities Relating of ruture) पाठशालाओं कालेजों तथा विश्वविद्यालयों में ‘ फ़्यूचर कौंसिल’ ‘, “फ्यूचर क्लब’ ‘ “फ़्यूयूचरोलोजी एसोसियेशन’ । आदि संगठित किये जा सकते है जिनमें निरंतर भविष्य संबंधी किसी विषय पर भाषण, चर्चा, गोष्ठि सेमीनार, फिल्म-शो, स्लाइड-शो, नाटक, ड्रामा, रोल-प्ले आदि आयोजित किये जा सकते है | भविष्य के प्रति चेतना जागत करने के लिए चित्रों व कार्टूनो की प्रदर्शनियाँ लगायी जा सकती है । जनसाधारण को भी इन क्रिया कलापों के माध्यम से भविष्य चेतना के विकास में लाभान्वित किया जा सकता है ।।

डेल्फी विधि (Delfi-technique)

पाठ्यक्रमों में भविष्योन्मुखता विकसित करना : (Future-orientation of curriculum) अब यह नितांत आवश्यक हो गया है कि पाठशालाओं और उच्च शिक्षा संस्थाओं के सभी प्रकार के पाठ्यक्रमों में चाहे वे प्राकृतिक विज्ञानों के पाठ्यक्रम हों या सामाजिक विज्ञानों के, अविलम्ब कीकरण किया जाये ताकि उनमें भविष्य की समस्याओं के प्रति सजगता परिलक्षित हो । घिसे-पिटे, संकुचित व गले-सई पाठ्यक्रमों से कैसे हम लोग नई पीढ़ियों का भविष्य बना सकते है? यह प्रश्न सभी शिक्षकों को अपने से और आप को भी स्वयं से पूछना होगा । भविष्य के भारतीय शिक्षक भविष्य के भारतीय शिक्षकों को आजकल के सामान्य शिक्षकों की तुलना में बहुत अधिक परिवर्तित और नये प्रकार का शिक्षक होना आवश्यक होगा, अन्यथा ते भावी समाज में नेतृत्व ही नहीं कर पायेंगे बल्कि टिक भी नहीं पायेंगे । भविष्य का सफल भारतीय शिक्षक ऐसी विशेषताओं से सम्पन्न होगा 😐

1. नये मूल्यों वाला व्यक्ति जो सार्थक परम्परागत मूल्यों और आवश्यक नये मूल्यों का  सही संतुलन अपने व्यक्तित्व में रखता है ।
2. वह न केवल अपने विषय में अपितु विभिन्न विषयों में उत्कृष्ट स्तर का पांडित्य रखताहो ।
3. वह विभिन्न प्रकार की व्यावहारिक कुशलताओं में दक्ष हो ।
4. वह सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक सुधार तथा भविष्य के विषय में सशक्त सामाजिक दार्शनिक सैद्धांतिक आस्था रखता हो ।
5. वह ज्ञानार्जन व ज्ञान प्रदान करने की विभिन्न विधियों व नई कुशलताओं में दक्षता रखता हो ।
6. जो विषय सामग्री को रखने-रखाने के स्थान पर नित्य हो नई कुशलताओं में दक्षता रखता हो ।
7. जो पाठ्यक्रम के निर्माण, टेलीविज़न व रेडियो के पाठों के निर्माण व अन्य शिक्षण उपकरणों के प्रयोग में दक्ष हो ।
8. जो अधिकारवादी व निरंकुश व्यक्तित्व वाला शिक्षक होने के स्थान पर सहृदय प्रेरणादायक, जनतन्त्रीय शिक्षक हो ।
9. जो विभिन्न प्रकार की संस्थाओं, समूहों व समितियों से उत्तम तालमेल रख सकता हो।
10. जो आत्मा को झकझोर देने वाली शिक्षा को यथार्थता और पूर्ण आस्था के साथ प्रदान कर सके ।

भविष्य चेतना उत्पन्न करने में शिक्षा की भूमिका भविष्य के प्रति सही प्रकार की चेतना अथवा रूझान उत्पन्न करने में शिक्षा संस्थाओं की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होनी चाहिए । यह इसलिये आवश्यक है कि
1. अधिकांश परिवारों में (विशेषकर भारत जैसे अधिकतर अशिक्षित व विकासशील देश में) माता-पिता को न तो इतना खाली समय ही होता है और न उनमें इतनी शिक्षा, ज्ञान और भविष्य के प्रति जिज्ञासा और चेतना ही होती है कि वे अपनी संतानों में भविष्य चेतना को प्रोत्साहित कर सके । यदि उनमें से कुछ करते भी हैं । (जैसा कि कुछ मध्यम वर्ग के माता-पिता करते है)तोवे अपने बालकों में भविष्य के प्रति भय, हीन भावना तथा अस्त व्यस्त् व अस्वस्थ प्रकार के भाव उत्पन्न कर देते है ।
2. समाज की अन्य संस्थाएं तथा अन्य कार्यस्थल व्यापारिक व औद्योगिक केंद्र अत आधुनिक बनने का प्रयास भले ह करते हों परन्तु उनमें न तो यह इच्छा ही पायी जाती है और न यह क्षमता ही होती है कि वे जनता में सही प्रकार से भविष्य के प्रति सही चेतना उत्पन्न कर सके ।
3. शिक्षा संस्थाओं का काम ही यह है कि वे विद्यार्थियों में सही प्रकार का ज्ञान, सही प्रकार के मूल्य, सही प्रकार की कुशलताएँ सही सम्मान तथा सही प्रकार का चिन्तन उत्पन्न करें । शिक्षा संस्थाएं विद्यार्थियों का सामाजीकरण, शिक्षण, व्यक्तित्व निर्माण, चरित्र निर्माण, तथा परिवर्तन व परिमार्जन करती है । अतः उन्हें भी भविष्य चेतना जागत करने का उत्तरदायित्व निभाना उचित ही नहीं अपितु आवश्यक भी है । ऐसा कार्य वे निम्नांकित प्रकारों से कर सकती है

(1) प्रत्यक्ष शिक्षण (Direct teaching) द्वारा भी शिक्षक व प्रवक्ता अपनी कक्षाओं में विद्यार्थियों को भविष्य की विविध प्रकार की संभावनाओं के बारे में, तथा विश्व के अतिआधुनिक समाजों में हो रहे द्रुतगामी तथा विचित्रतापूर्ण परिवर्तनों व उनके सामाजिक परिणामों के बारे में ठोस जानकारी, आकड़े, चित्र प्रस्तुतीकरण तथा उस पर अपने मत दे सकते है ।
(2) भविष्य संबंधी खेलों (future games) दवारा विविध प्रकार की काल्पनिक परिस्थितियों के विकल्पों को सोचने जैसे, घटनाओं की संभावनाओं संबंधी चिन्तन के अभ्यासों तथा मौनोपोली (monopoly), साँप-सीढी, चाहनीज चैकर जैसे खेलों द्वारा विद्यार्थियों में
भविष्यचेतना का प्रचुरमात्रा में प्रभावशाली ढंग से विकास किया जा सकता है ।

 भविष्य शिक्षा के उद्देश्य

भविष्य शास्त्र एक नया विषय है जो कि निर्माणावस्था में है । बेन्सन बेल भविष्य सम्बन्धी इस विज्ञान के सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त करते हुये कहा कि भविष्य के इस अध्ययन का न तो वर्णन किया जा सकता है और न ही यह प्रमुखतः भविष्यवाणी ही है । यह नव प्रयोग तथा मार्गदर्शन है । इसके अन्तर्गत मूल्यों और लक्षों का स्पष्टीकरण और मूल्यांकन, प्रवृर्तियों का विवरण दिया जाता है तथा इसमें वैकल्पिक भविष्यों का प्रारम्भीकरण तथा अन्तःनिर्भरताओं के क्रमों का विवरण आता है । इसके अनेक उद्देश्य हैं 😐

1. भविष्य के प्रति चेतना
भविष्य शिक्षा भविष्य के प्रति उदारवादी तत्व को प्रधानता देती है जो शिक्षा को भविष्य के प्रति संचेतना विकसित कर सके ।।
2. व्यावहारिक कुशलताओं का विकास | भविष्यमिति बालक में व्यावहारिकता के गुणों का विकास करती है । व्यावहारिक गुणों के विकास के द्वारा भविष्य की कल्पना कर पाना आसान है ।।
3. नवीन योजना निर्माण व क्रियान्वयन

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *